राजनैतिक हास्य व्यंग(हिन्दी)। वोटो के दौर में।

वोटों के दौर में, अपनी तारीफों के होड़ में 
एक बार एक नेता जी, मेरे कस्बे में आए
उनके साथ उनके कुछ चमचे भी उनके साथ आए 
प्रभात ने सोचा, क्यों ना नेताजी को सुना जाए 
राजनीत देखी लाखों की, इन पर भी समय बर्बाद किया जाए
 इसी लालसा में मैं, आगे बढ़ता गया 
धीरे-धीरे स्टेज तक पहुंचता गया, 
तभी स्टेज से एक जोरदार आवाज आई
नेता जी की जय हो, एक चमचे ने आवाज लगाई 
इसी जयकारे के साथ, नेताजी खादी लपेटे स्टेज पर आ गए                             
 माइक पर हाथ जोड़ कर बोले 
मैं 5 साल बाद फिर आपके दर पर आया हूं 
थोड़ी झोली खाली है, उसको भरने आया हूं 
पहले चुनाव में वोट देकर, आपने मुझको जिताया था 
फिर 5 साल तक हमें, आपका चेहरा ना याद आया था 
बस आज भी एक वोट का सवाल है
मुझको अपना वादा याद है 
मैं इस दुनिया से बेरोजगारी मिटा दूंगा 
सभी को रोजगार दिलाऊंगा 
और इसी बेरोजगारी में मैं भी लाखो कमाऊंगा 
मुझे एक मौका और दिला देना,
मेरे साथ पुस्तो की बेरोजगारी मिटा देना 
तभी पीछे खड़े एक चमचे ने धीरे से बोला 
नेता जी यह आपने क्या कह डाला 
रोजगार के नाम पर क्यों सबको भ्रम में डाला 
इस पर नेताजी उस पर जोर से भड़के 
तू राजनीति क्या जानता है, 
इसलिए तो तू मेरे पीछे भागता है 
जिस दिन तू, झूठ बोलना जान जाएगा 
मेरी जगह तू भी मंत्री बन जाएगा 
मैंने बेरोजगारी को कितने चुनाव में, जीत का हार बनाया है, 
इसलिए जनता की गाढ़ी कमाई पर, अपना अधिकार बनाया है 
मैं अगले चुनाव में किसी और पार्टी से आ जाऊंगा 
अपनी झूठ और नाकामी की रोटी, पहली पार्टी के सर मढ़ जाऊंगा 
फिर बेरोजगारी पर वोट मांग लाऊंगा 
और फिर इसी बेरोजगारी को जीत का हार बनाऊंगा। 
                      
                                                         -प्रभात द्विवेदी

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